क्या आपको पता है ? सबसे पहले किसने और कहां से शुरू की थी कांवड़ यात्रा

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नमस्कार दोस्तों…आप तो जानते ही है कि फिलहाल सावन का महिना चल रहा है और हमें हर जगह शिव भक्त देखने को मिल ही जाते है। शिव मंदिरों में भी दर्शन के लिए भक्तों की काफी भीड रहती है। श्रावण मास में कई शिव भक्त कांवड यात्रा पर भी जाते है। इस दौरान वे कांवड में गंगाजल भरकर शिव भगवान का जलाभिषेक करते है और उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते है।

आपने और हमने कई बार देखा होगा कि, श्रावण मास के दौरान में ही ये कांवड यात्रा निकाली जाती है। लेकिन क्या आप जानते है कि ये कांवड यात्रा के पीछे की क्या प्रथा है। शायद आप का जवाब ना ही होगा। तो आज हम इस आर्टिकल में आप को बताएंगे कि आखिर ये कांवड यात्रा की शुरुआत किसने की थी। तो आइए विस्तार से जानते है।

कांवड यात्रा का इतिहास

भगवान परशुराम के बारे में सभी ने सुना होगा। बता दें कि वे बहुत बडे शिवभक्त थे और उन्होंने ही सबसे पहले कांवड यात्रा की शुरुआत की थी। न्होंने ‘गढ़मुक्तेश्वर’ से गंगाजल भरकर ‘पुरा महादेव’ तक गए थे और भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। जब भगवान परशुराम ने पहली बार भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। उस वक्त सावन का महीना चल रहा था। इसी तरह से शिव भक्त हर सावन के महिने कांवड यात्रा निकालते है।

कितने प्रकार की होती है कांवड यात्रा

समय के साथ बदलाव आता रहता है। तो आइए तरह-तरह की कांवड यात्रा के बारे में जानते है।

(1) खडी कांवड


सबसे ज्यादा कठिन कांवड यात्रा ‘खडी कांवड’ है। इस कांवड़ यात्रा में लोग अपने कंधे पर कांवड़ लेकर चलते हैं और इस दौरान वो कांवड़ को किसी भी जगह रख नहीं सकते और ना ही कहीं टांग सकते हैं।

(2) झांकी वाली कांवड


इस कांवड़ यात्रा में कांवड़ियां किसी ट्रक, जीप या खुली गाड़ी में शिव की मूर्ति लगाकर और साथ में गाने-बाजे के साथ झूमते हुए जाते हैं।

(3) डाक कांवड

कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त झूमते हुए जाते हैं लेकिन, जब मंदिर से दूरी 36 घंटे या फिर 24 घंटे की रह जाती है, तो कांवड़ियां गंगाजल लेकर दौड़ते हुए जाते हैं।

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